RAHUL GANDHI PUNE EVENT : कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दल क्या कभी मनुस्मृति का सहारा अपनी राजनीति चमकाने के लिए करना बंद करेंगे? दरअसल, ऐसा सवाल करना कांग्रेस या फिर अन्य विपक्षी दलों का विरोध करना नहीं है। देश में संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी दी है और उसके अनुसार कोई भी कुछ भी बोल सकता है, हालांकि यह समझने की बात है कि यह कुछ भी बोलना कितना उचित है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पुणे में छात्राओं को संबोधित करते हुए दावा किया है कि मनुस्मृति ने स्त्री को पुरुषों के अधीन कर दिया है, उन्हें संपत्ति बना दिया है। फिर वे उद्घोषित करते हैं कि मनुस्मृति का पिंजड़ा तोड़ दो क्योंकि महिलाएं गुलाम नहीं हैं। सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा हुआ है और यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर कांग्रेस को अपने तर्क पेश करने के लिए हिंदू प्रतीक चिन्ह ही उपलब्ध हैं।
क्या इसे वैचारिक विद्रोह पैदा करना नहीं कहेंगे
राहुल गांधी के वक्तव्य देश बहुत समय से सुन रहा है। हालांकि बीते कुछ महीनों के दौरान उन्होंने जिस प्रकार से भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जनसरोकारों की चिंता करना आरंभ किया है, उससे संभव है, कांग्रेस को बहुत लाभ हो रहा है। हालांकि सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी इस प्रकार की बातों से समाज में वैचारिक विद्रोह पैदा करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। दरअसल, भारतीय समाज चाहे वह किसी भी धर्म या जाति-संप्रदाय से हो, महिलाओं को महज मनुस्मृति के आधार पर सम्मान या फिर सुरक्षा नहीं देता है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि मनुस्मृति कहती है कि एक महिला को पहले अपने पिता, फिर पति और फिर पुत्र के आश्रित रहना चाहिए। क्या धार्मिक ग्रंथों में लिखी बातों का एकमात्र सार यही हो सकता है, जिसे नेता विपक्ष परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
एक बेटी का पिता ही सबसे बड़ा अभिभावक
आखिर इस सच से कौन इनकार कर सकता है कि एक बेटी का पिता ही सबसे बड़ा अभिभावक होता है, उसके बाद शादी के बाद पति और फिर पुत्र उसकी जगह लेता है। यह संस्कारों की वह श्रृंखला है, जोकि भारतीय समाज का आधार है। इसे इस तरह देखना कि महिलाएं पुरुष के अधीन हैं, संकीर्ण सोच है। मालूम हो, एक समय भारतीय समाज महिलाओं के प्रति ऐसी सोच रखता था कि उनकी पढ़ाई-लिखाई और घर से बाहर निकलना भी दुश्वार था, लेकिन यह सोच भी बदलती गई और आज बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओं का नारा देते हुए महिलाओं का सशक्तीकरण राजनीतिक-सामाजिक विषय बन चुका है। निश्चित रूप से महिलाओं ने हर क्षेत्र में तरक्की के नए मापदंड घड़ दिए हैं लेकिन क्या इसकी अनदेखी की जा सकती है कि नारी शक्ति को उसकी पहचान प्रदान करने में पुरुष ने भी योगदान दिया है। क्या राहुल गांधी हरियाणा की उन महिला पहलवानों की कहानी नहीं जानते, जिनके पिता एवं ताऊ ने उन बेटियों को अंतर्राष्ट्रीय पहलवान बनाकर इतिहास ही रच दिया। यह सफलता आखिर उन बेटियों ने अपने पिता या फिर अन्य बड़े की निगरानी में ही तो हासिल की है।
महिलाओं काे समाज में करना पड़ रहा संघर्ष
वास्तव में इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी भारतीय समाज में महिलाओं को अपनी जगह के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन यह भी समझना आवश्यक है कि समाज का ताना-बाना महिला और पुरुष दोनों के समन्वय से है। नेता विपक्ष एक समाज शास्त्री होते तो संभव है, उनकी कही बातों को उसी संदर्भ में लिया जाता। लेकिन वे एक सांसद हैं, राजनीतिक हैं और देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के अप्रत्यक्ष सर्वेसर्वा भी हैं, तो उनकी बातों के राजनीतिक मायने ही निकाले जाएंगे। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में जंतर-मंतर पर छात्राओं, युवतियों ने अभद्र बातें कही थी, अब नेता विपक्ष राहुल गांधी पूछ रहे हैं कि लड़के गाली दें तो कोई सांस्कृतिक झटका नहीं लगता, लेकिन लड़कियां ऐसा करें तो सवाल उठाया जाता है।
लड़कियों के गाली देने पर भी राजनीति
जाहिर है, गाली देना न लड़कों के लिए उचित है, और न ही लड़कियों के लिए। हालांकि यह देखने को मिला है कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री की ओर से गाली देने वाली लड़कियों को माफ करने पर भी राजनीति की है। एक राजनीतिक दल की ओर से संबंधित लड़की जिसने ऐसी अभद्रता की, उसे शाबासी देते हुए उसके साथ खड़े होने का भी ऐलान किया। क्या नेता विपक्ष राहुल गांधी इस पर टिप्पणी करेंगे और संबंधित राजनीतिक दल की ओर से किए गए कारनामे का समर्थन या विरोध करेंगे। वास्तव में कुछ बातें केवल मुहावरे की तरह इस्तेमाल की जाती हैं और उनके पक्ष या विपक्ष में बोलने का साहस कोई नहीं कर पाता।
दरअसल, सबसे बड़ा प्रश्न भी यह है कि आखिर राजनीति करने के लिए कांग्रेस को हिंदू प्रतीक ही क्यों चाहिए होते हैं। देश में अन्य धर्म और उनके धर्मावलंबी भी हैं, तब उनके माध्यम से राहुल गांधी अपने तर्कों को पेश क्यों नहीं कर पाते। यह भी समझने योग्य है कि क्या वास्तव में नेता विपक्ष ने वास्तव में सभी हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर लिया है। जबकि वास्तविकता यह है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में देश के इतिहास को भी मुस्लिम तुष्टिकरण की नजर से अलग ही संदर्भों में पेश करवाया है। आज की पीढ़ी को मुस्लिम शासकों के तमाम नाम याद होंगे, लेकिन उन्हें हिंदू शासकों के गिनती के नाम भी याद नहीं होंगे। क्या सच में मुस्लिम शासक इतने महत्वपूर्ण थे।