RAHUL GANDHI ON DALIT MATTERS : क्या इस देश में कोई इससे इंकार कर सकता है कि यहां जाति नहीं हैं। देश की आजादी से पहले जातियों की जो रंगत थी, वह अब पहले से बेशक कुछ कम है, लेकिन जाति दाग की भांति हैं, जिनका निशाना कभी हल्का नहीं पड़ा है। जाति जैसे एक ताज है, उनके लिए जोकि समाज को चार वर्णों में विभाजित होने के बाद ऊपरी वर्णों में होने का सुख भोग रहे हैं। यह उनके लिए ऐसा तगमा है, जिसे वे अपनी छाती पर लगाकर घूमते हैं और दावा करते हैं कि वे समाज में सर्वोच्च हैं। बेशक, जंतर-मंतर पर आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर जब इन्हीं ऊपरी वर्णों के लोग जमा होते हैं, तब भी वे अपने इस तगमे को सीने से लगाए हुए ही वहां पहुंचते हैं।
चमार की जगह मेघवाल
हाल ही में हरियाणा में जब मुख्यमंत्री नायब सैनी ने रेवाड़ी में चार वर्णों के समाज में सबसे निचले पायदान पर आने वाले क्षुद्र समाज के अगुवा चमारों की अपनी जाति का नाम बदल कर इसे मेघवाल नाम देने की मांग को स्वीकार किया, उसके बाद समाज, मीडिया और जहां-तहां इस बारे में जिस दबी जुबान में बातें कही गईं, वे यह बताने को काफी थी कि आजादी के 79 साल बाद भी जाति का दंश वही है, उसके पीड़ित अपने लिए निर्धारित किए गए संबोधन से आत्मा की गहराई तक पीड़ित और परेशान हैं।
अगर ऐसा न होता तो वे चमार नाम को मेघवाल से बदलने की मांग नहीं करते। आखिर इस शब्द में ऐसा क्या बुरा है, जिसे जुबान पर लेते हुए इस जातिधारकों की जुबान कांपने लगती है और पायदान के अग्रिम मोर्चे पर बैठी जातियों के लिए यह शब्द जैसे अपना जूता निकाल कर किसी के मुंह पर मारने की इच्छा होती है। सदियों से यही चला आ रहा है, जब समाज के अग्रज इसका सुख भोगते आए हैं, कि उन्होंने कुछ लोगों को ऐसा नाम दिया है, जिससे वे पीढ़ी दर पीढ़ी चिपके हुए हैं और चाहकर भी खुद को उससे अलग नहीं कर पा रहे। चमार से मेघवाल होने की व्यथा का यही सार है।
तो दबी जुबान में कहा गया-क्या बदल जाएगा
मालूम हो, ऐसी चर्चाएं हैं कि जब हरियाणा में मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद मीडिया के दफ्तरों में इस खबर को संपादन करने की बात आई तो पहले इसे अंग्रेजी और हिंदी मीडिया में बांट कर देखा गया कि अंग्रेजी में कैसे छप रही है और हिंदी में कैसे। उसके बाद यह कहा गया कि हेडिंग में चमार शब्द नहीं देना है, अंदर चाहे बेशक दे दो। इसे लेकर फिर घंटों बहसें होती रही कि सीधे चमार क्यों न लिखा जाए। लोग फिर दबी जुबान में यह कहते सुने गए कि आखिर इससे क्या हो जाएगा, रहेंगे तो वे वही। कुछ का यह तर्क था कि जब वे यानी चमार खुद अपना नाम लेकर संस्था बनाते हैं, तब हमारी ओर से सार्वजनिक तौर पर क्यों न यह नाम लिया जाए। बहरहाल, प्रश्न यह है कि आखिर चमार शब्द बोलते हुए अग्रज क्यों झेंपते हैं या फिर इसे सुनते हुए इस जात के लोग। मामला यह भी है कि क्या दलित वर्ग की अन्य जातियों के मामले में भी यही हो रहा है। जबकि जाटव, बाल्मीकि और धानक समेत दूसरी जातियों का नाम पूरे धड़ल्ले से लिया जाता है। वहां तो शर्मसार होने जैसी बात नजर नहीं आती। वहां तो मंत्री, विधायक तक अपने नाम के साथ इन जातियों के नाम लगाते हैं।
कांग्रेस को आई है दलितों की याद
दरअसल, देश में आजकल जातिवाद का जिन्न फिर से बलवान हो उठा है। कहीं जातिवादी आरक्षण खत्म करने की मांग हो रही है तो कहीं पर इसे कोई खैरात न होना साबित करने में जुटा है। लेकिन कांग्रेस को दलितों की याद इसलिए हो आई है, क्योंकि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद कथित रूप से उस जगह का शुद्धिकरण किया गया। अब खड़गे साहब दलित हैं, उन्हें इसका अहसास हुआ तो वे अपमानित महसूस करने लगे और संसद में उन्होंने इस मामले को उठा दिया। हालांकि प्रश्न यही है कि क्या समाज में इस वर्ग के बाकी लोगों के साथ रोजाना की जिंदगी में जो घटता है, क्या उसकी आवाज उठाने की जरूरत उन्हें संसद में या फिर अन्य जगह महसूस होती है?
रैली में अकेले खड़गे का अपमान नहीं हुआ
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इसे भाजपा और आरएसएस की सोच से जुड़ा बता दिया। क्या राहुल गांधी सच में समझते हैं कि दलित होने की पीड़ा क्या है, उत्तराखंड में हुई कांग्रेस की उस रैली में अन्य दलित नेता भी थे, अगर कथित शुद्धिकरण के नाम पर अपमान हुआ तो यह सभी दलित नेताओं का अपमान था, फिर अकेले खड़गे ही खुद को क्यों बलिवेदी पर चढ़ा बता रहे हैं। बात यह भी है कि देश में दलितों की पैरोकार बनने का दंभ भरने वाली कांग्रेस ने अपने शासनकाल में कब इस वर्ग के सम्मान और इसके स्वाभिमान को आगे बढ़ाने के प्रयास किए हैं। क्या आरक्षण को बनाए रखने की घोषणा ही इस वर्ग के सम्मान की गारंटी है। कांग्रेस में दलित अध्यक्षों का किस प्रकार अग्रज सम्मान करते हैं, इसका उदाहरण हरियाणा से मिलता है, जहां एक दलित अध्यक्ष से मारपीट कर उनकी गर्दन में ही मोच ला दी गई थी। और उसके बाद एक दलित महिला नेता को रह-रहकर अपमानित किया गया। क्या कांग्रेस ने कभी उन दलित नेताओं के अपमान के विरोध में कोई शुद्धिकरण किया, जबकि वहां सबसे ज्यादा इसकी जरूरत थी। कांग्रेस का दलितों के दर्द के प्रति यह दिखावा चुनावों के लिए है, यह सहानुभूति महज दलित चेतना को चिंगारी देकर वोट हासिल करने की लिप्सा तक सीमित है।
वैसे यह भी तथ्य है कि रैली के बाद उस जगह का कथित शुद्धिकरण जाति विशेष के विरोध की वजह से नहीं हुआ है, अपितु राजनीतिक सोच के विरोध की सोच से हुआ है। जरूरी यह है कि समाज का सुधार करने की अगर किसी में इच्छा है तो वह संविधान निर्माता डॉ आंबेडकर की तरह जातिवाद का विरोध करे और जाति हीन समाज की सोच को आगे बढ़ाए। क्या किसी में इसका साहस है?